Friday, 31 July 2026

ईश्वर

ईश्वर



मेरे लिए ईश्वर ,मेरी सभ्यता का सांस्कृतिक अवचेतन है

सृष्टि और समाज की अवधारणा का आदिम बीज है

ईश्वर की भिन्न-भिन्न परिकल्पना में मूझे दिखती हैं

भूतपूर्व मनुष्यों के जीवन-काल की भिन्न-भिन्न परिस्थितिकी

उनके जिन्दा रहने की समझदारियों और विफलताकारी मूढ़ताओं का

रहस्य भी खुलता जाता है….

 

पश्चिम के असुरक्षित, प्रतिस्पर्धी और जोखिमपूर्ण जीवनानुभवो वाले पूर्वजों ने

ईश्वर पर पूरा विश्वास नहीं किया

सब कुछ ईश्वर और प्रकृति के भरोसे नहीं छोड़ा

हितैषी ईश्वर के साथ - साथ

सबका बुरा चाहने वाले शैतान की भी परिकल्पना की

प्रकृति के विपरीत बुरे व्यवहार का भी साक्षात्कार किया

जबकि उपजाऊ सुरक्षित पर्यावरण पाकर आलसी भारतीय पूर्वजों ने

असंदिग्ध चरित्र वाले अनुकूल ईश्वर की अवधारणा विकसित की

और अपने असावधान चित्त के कारण

बार-बार चले गए ..

 

हर अवधारणा के विकास का इतिहास होता है

ईश्वर की अवधारणा का भी है

जिसकी मानवीय निर्मित को साफ़ - साफ पहचाना जा सकता है

जिसका ईश्वर जैसी किसी वास्तविक सत्ता के होने

या बिल्कुल ही न होने से कोई संबंध नहीं

 

एक अवधारणा के रूप में भारतीय ईश्वर

एक सुरक्षित , लयात्मक और आत्मीय पर्यावरण के निर्माण और होने की

प्रागैतिहासिक विज्ञप्ति है…

 

नए युग की अवधारणा की दृष्टि से

पहली समस्या ईश्वर को पुनर्परिभाषित करने की है

यद्यपि ईश्वर प्रागैतिहासिक कालीन काव्यात्मक अवधारणा है लेकिन बाद में विकसित सामन्तकालीन व्यवस्था

और पेशेवर पुरोहितवाद ने

उसका आदर्श चेहरा बिगाड़ दिया है

इसीलिए नए सिरे से उसके निर्दोष स्वरूप की अवधारणा करनी होगी।

 

ईश्वर वस्तुत: वृहत्तर अस्तित्व का जीवन और चेतना धर्मी साक्षात्कार है

सहजीवन की जटिलतम पारस्परिकता का मानवोचित साकार है

 

इसलिए सिर्फ नास्तिक होने मात्र से ही

ईश्वर के होने या न होने का प्रश्न समाप्त नहीं हो जाता

इस दुनिया को एक सतत-सक्रिय और विवेकपूर्ण ईश्वर की अनवरत अस्तित्वपर्यंत जरूरत है

चाहे वह अलंघनीय नियमों की माननीय सत्ता के रूप में ही क्यों न हो.....

 

इसलिए ईश्वर कहीं नहीं है यह कहना ही काफी नहीं

यदि ईश्वर एक रिक्ति है तब तो और भी जरूरी हो जाता है कि

जिनके भी पास ईश्वर होने की सामर्थ्य है वे आगे आएं

जिनके भी ईश्वर होने की संभावना है वे आगे आएं

 

मेरे लिए ईश्वर स्वत: स्फूर्त परिष्करण की क्षमता वाली

आदर्श एवं पूर्ण स्वतंत्रता की प्राप्ति के लक्ष्य वाली व्यवस्था की खोज है

 

सबसे अंत में मेरे लिए किसी वास्तविक ईश्वर का होना

प्रकृति में व्याप्त चेतना और समझदारी के अतिरिक्त

भौतिक जगत में जीवन के अस्तित्व की

बीज रूप में प्रकृति की स्मृति में बने रहने की

किसी सृजनात्मक व्यवस्था के होने की पुष्टिकारी आस्था है

  

Thursday, 30 July 2026

samaj banam bhasha

 https://www.jansatta.com/duniya-mere-aage/opinion-on-society-versus-language/236783/

Monday, 13 October 2025

The God of Experience

 The God of Experience


The God of experience
is shaped by the climate of being,
by the subtle weight of qualities,
by the secret algebra of cause and consequence.

The God of experience
is not a deity distant in heaven—
He ripens in the soil of conduct,
He breathes in the harvest of reality.

Is He always the sovereign Ideal,
the constitutional flame
of existence and action?
Or is He sometimes
only the echo of our lived truth—
a mirror, not a throne?



Ramprakash Kushwaha
27/08/2025

Thursday, 30 May 2024

Middle of the road


Middle of the road 

There is organized prejudice everywhere
There are huge complexes of ill intentions
all are revolutionaries
and also victims of encroachment 
no one in their right place
move on each other
surpass each other

It is forbidden to walk on the middle of the road
Only the line of prohibition has gone through the middle
If you have to walk then just take the left.
or right side
there is no middle path 
there is no middle ground
Everyone is welcome
accident is invited


The direction in which the flow of people is moving 
there is hardly any way forward
Only one wall can be seen going far away 
There is a closed door ahead.
 There is no way out from here!

My feet are moving like time
while hands are tied
eyes closed
mind is closed
the speed is slow
There is conflict!








 मार्ग-मध्य 


जगह-जगह संगठित पूर्वाग्रह है
दुर्भावनाओं के बडे-बडे परिसर हैं
सभी अतिक्रान्ती हैं
और अतिक्रमण के शिकार भी 
कोई  भी अपनी सही जगह पर नहीं
एक-दूसरे पर बढे-चले
एक-दूसरे से बढ़चढ़कर है

रास्ते पर बीच से चलना मना है
बीच से सिर्फ वर्जना की लकीर गयी है
चलना भी है तो सिर्फ बाएं का
या फिर दाएं का
बीच का कोई  रास्ता ही नहीं है
कहीं कोई मार्ग मध्य में नहीं है
सभी ज्यों अभिमंत्रित हैं
दुर्घटना के आमंत्रित हैं 

जिस दिशा में बढ़ रहा है जन-प्रवाह 
आगे शायद ही कोई रास्ता हो
सिर्फ एक दीवार दूर तक जाती हुई दिखाई दे रही 
आगे दिख रहा एक  बंद-सा  दरवाजा है
 इधर से कोई  भी रास्ता नहीं जाता  है !

पैर तो समय की तरह चल रहा है
जबकि हाथ बंधे हैं
आंख बन्द है
दिमाग बन्द ।है
गति मन्द है
द्वन्द्व है !

Tuesday, 28 May 2024

Human birth

Human birth 

What is happening to  man
rebirth in human body 
so human brain 
human mind 
human self realization 
And his qualitative abilities will also be there.  

Will come back again and again
reproducer of life
same chromosome 
same habits
same circumstances 
bound by physical, chemical and biological laws
in this repetitive universe
and species 
as a multidimensional being
Like innumerable words made from the same alphabet
Will repeat it again and again...

Something like this
monomorphic species
naked body of a naga sadhu
a priest's braid
And sponsored by some mullah 
and take the form of a specialized beard
Will continue to pretend that man is nowhere!

giving the impression that
in a straight forward manner
He is shy of being a human being...
You are afraid of being called a human being and of living...

Ramprakash Kushwaha











मानुष जन्म 

हो रहा है मनुष्य का
मनुष्य की देह में पुनर्जन्म 
तो मनुष्य के दिमाग 
मनुष्य के मन 
मनुष्य के आत्मबोध 
और उसकी गुणात्मक क्षमताओं का भी होगा ही.  

बार-बार लौट आएंगे
जीवन के पुनरूत्पादक
वही-वही गुण-सूत्र 
वही-वही आदतें
वही-वही परिस्थितियाँ 
भौतिक,रासायनिक और जैविक नियमों से बंधे
इस आवृत्तिमय  ब्रह्मांड में
और प्रजाति के 
बहुआयामी अस्तित्व के रुप में
उसे ही वर्णमााला से बने असंख्य शब्दों  की तरह
बार-बार उसे ही दोहराएंगे ....

कुछ इस तरह कि
एक ही बहुरूपिया प्रजाति
किसी नागा साधु  की नंगी देह
किसी पंडित की चोटी
और किसी मुल्ला की प्रायोजित 
और विशेषीकृत दाढी का रूप  ले
मनुष्य के कहीं न होने का स्वांग भरती रहेगी  !

कुुछ ऐसा प्रतीत कराती हुई  कि
सीधे-सच्चे रंग और ढंग से
वह मनुष्य होने से ही शर्माता हो.....
मनुुष्य कहलाने  और जीने से ही डरता हो...

रामप्रकाश कुशवाहा

ईश्वर

ईश्वर मेरे लिए ईश्वर , मेरी सभ्यता का सांस्कृतिक अवचेतन है सृष्टि और समाज की अवधारणा का आदिम बीज है ईश्वर की भिन...